kavita by Shambhu Nath

खिलती मेरी जवानी थी
परिंदे न देख पाये ॥
सम्मान लिए संस्कार ॥
सामने ही ठहरा था ॥
इज्जत ने आदेशो का ॥
लगाया जो पहरा था ॥
बाप की प्यारी थी
माँ की दुलारी थी
हुस्न के लिबास में
सजी राजकुमारी थी ॥
शक का संबंध पिता का
पिता का बहुत गहरा था ॥
इज्जत ने आदेशो का ॥
लगाया जो पहरा था ॥
मजाल नहीं थी आँखे
मचल कही भी जाये ॥
कौन अपनी मौत को ॥
बिन मतलब को बुलाये ॥
भाई भी मेरा मुझसे ॥
नहिले पर दहला था ॥
इज्जत ने आदेशो का ॥
लगाया जो पहरा था ॥
दाग नहीं लगे मुझे ॥
हो गया विवाह ॥
माँ बाप आज भी मुझे ॥
करते रहे आगाह ॥
आँगन में खुशियो का ॥
सजा रहा सहरा था ॥
इज्जत ने आदेशो का ॥
लगाया जो पहरा था ॥

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