#Kavita by Shiva Kumar Pandit

धन-दौलत के फेर में , लगा रहें सब दौड़ |
भटक रहें प्रस्तर वन में, नाते रिस्ते तोड़  ||
जो जितना ही खा रहा, जिसके जितने लोग |
जनादेश के देश में , उसको लगता भोग ||
लक्ष्य स्पष्ट हो यदि , झोंके हो मन देह |
पाना मुश्किल है नहीं , मन मत रख संदेह ||
कौन क्या है कर रहा , किसे क्या है चाह |
इसे देखने से भला , पकड़ो अपनी राह ||
कैसे-कैसे लोग हैं ,   पहले  तू  पहचान |
मन की बात उससे कर ,जो रखता हो मान |
द्वेष में उम्र बीती , बीत   गया   संसार  |
फिर भी मन अतुष्ट रहा ,न मिला कभी करार ||
कौन बड़ा कौन छोटा , सब सांई के पूत |
पंडित मद में चूर क्यों , अंत बनोगे भूत ||
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शिव कुमार पंडित
कोलाकुसमा,धनबाद

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