kavita by Shiva Kumar Pandit

मेघगीत
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सखी रे ! दरद न जाने मेघना |
हृदय- हरित-तरु सूख गये सब , पंछी लोटकर मरना ||
कोमल वन-मन मुरक्षित हो गए , प्रिय बिन जीया तरसना |
का करे आय मन मुरझाय , कुछ भी नहीं अब बचना ||
ताल-तलैया तीखे कंटक , बगुला बाज का रोना |
पथिक-पखेरू भटकन लागे , जहं-तहं नीर बिना ||
जोहत-जोहत आहट उनकी , थक गयी अब रे नैना |
‘ शिव ‘ श्याम – घन धन बिना , जग में क्या है करना ||

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