kavita by Shiva Kumar Pandit

वनवासी
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रात बीती सुबह हुई
नये सफर की चहल हुई
सदियों के तिमिरवन से
मुक्ति हेतु पहल हुई

आजादी तो कहने को है
संस्कारों में कब छूट मिली
रीतियों मे संग होने में
अपमानों की चोट मिली

नगर शहर से विलग रहे
पर्वत-वन  में पड़े रहे
न आकांक्षा न ईर्ष्या द्वेष
प्रेम ही प्रेम से भरे रहे

उन्नति और विकास में
अधुनातन के अहसास में
उनका भी योगदान रहा
भारत का सम्मान रहा

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