#Kavita by Sushila Joshi

परिक्रमा

दबी पताका चढ़ती देखी

ज्वालामुखी आधारों में

नग्न विदेशीपन भी देखा

पिता के अचारों में

उन्नति की दौड़ में देखे

चाटुकार आगे बढ़ते

कर्मठ मानव साँसे भरता

पौड़ी पौड़ी पर चढ़ते

सृष्टि मुस्काती देखी है

स्वतः उपजते फूलो में

उसका तीखापन भी देखा

मैंने नुकीले शूलों में

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