#Kavita by Sushila Joshi

#  ओस की बूंद #

रात की वेदना ओस की बूंद है

पीर की चेतना ओस की बूंद है ।

ठिठुर कर गिरी फूल की देह पर

उर की वर्जना ओस की बूंद है ।

रवि रश्मियों से झिलमिला कर उठी

किरणों से जूझना ओस की बूंद है ।

छोटी सी जिंदगी छोटा संसार है

काल की कल्पना ओस की बूंद है ।

उषा की हंसी से वो  घबरा गयीं

जीने की चाहना ओस की बूंद है ।

– – – – – – – सुशीला जोशी

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