#Kavita by Ved Pal Singh

ये नज़ारे मुझे रास नही आते………..

जब अपने हुए दूर और वो पास नहीं आते,
महफ़िलों के ये नज़ारे मुझे रास नही आते।

मैं किसको जा सुनाऊँ अपने दिल का दर्द,
धड़कनें सुस्त पड़ गयीं साँसें हो गयीं सर्द।
दूर तलक वो चेहरे नज़र खास नही आते,
महफ़िलों के ये नज़ारे मुझे रास नही आते।

अब अपनी नही खबर अपनों का नही पता,
ना मेरी कोई भूल है ना उनकी ही थी खता।
क्यूँ अपने जुदा हुए अब आभास नही आते,
महफ़िलों के ये नज़ारे मुझे रास नही आते।

सहरा सा पसर रहा है नही कोई है ठिकाना,
भटक रहा हूँ बेसुध उसमे होकर मैं बेगाना।
जमाने को कभी लोग यहाँ उदास नहीं भाते,
महफ़िलों के ये नज़ारे मुझे रास नही आते।

आँखों की नमी से कभी आँसू भी बह जाता,
हवा बजती कानों में जैसे कोई मुझे बुलाता।
यादों के उठते तूफान के कयास नही आते,
महफ़िलों के ये नज़ारे मुझे रास नही आते।

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