kavita by VINAY SAMADHIYA

अलवेला बचपन

याद आते हैं तरूवर, नदियाँ वो झरने,
जहाँ रूठकर, छिपते छिपाते से जाना ,
वो ममता का ऑगन, वो मां को सताना ,
सभी टूटकर, रह गए एक सपना ,
सपना सा लगता है , बचपन भी अपना ,
कभी बहिना से झगड़ा ,कभी उसको मनाना ,
उसकी छोटी सी बातें ,बढ़ चढ़कर बताना ,
उसके प्यारे से किस्से ,कहानी सुनाना ,
नहीं स्कूल जाना ,तो बहाने बनाना
करके हर एक गलती ,दादी को बताना
कहो मुझको पापा से ,अब तुमही बचाना
बङी अठखेलियां की हैं,दादाजी की गोद में
वो भी खोए से रहते, मेरे आमोद में
बुआजी को चिढाकर, सभी को हंसाना
याद आते हैं तरूवर, नदियाँ वो झरने ।
जहाँ रूठकर, छिपते छिपाते से जाना ।।
वो गर्मी की छुट्टी ,मनमर्जी का बहाना
मामा का ऑगन, नानी का बुलाना
संग नाना के जाकर, खिलौने ले आना
वो कटोरे में सत्तू, फुल्की चने की बनाना
देशी घी का वो तङका ,संग बैगन का भर्ता
खूब मस्ती भी होती ,तंग सबको था करता
वो गलियां भी भूले,जहां बीता था बचपन
संग दोस्तो के दोपहरी ,जहाँ लगती सुहानी
कई नाम ले लेकर,मुझको बुलातीं थी नानी
क्या वो पनघट कुॅए का ,जहाँ जमकर नहाना
जो न हुई माँग पूरी ,झूठे ऑसू बहाना
वो पीपल की छाया ,उसका चबूतरा पुराना
जहाँ लगते थे जमघट,आता सारा जमाना
याद आते हैं तरूवर, नदियाँ वो झरने ।
जहाँ रूठकर, छिपते छिपाते से जाना ।।

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