#Kavita by Vinod Sagar

. लाश और दुःखदायी यादें

 

शरीर चाहे जितना सुंदर हो

अगर वह लाश में बदल जाये

तो फिर वह रखने की वस्तु

नहीं जाती कदाचित् घर में।

ठीक उसी के तर्ज़ पर अगर

दिलबर से रिश्ता टूट जाये

तो फिर उसकी मीठी यादें भी

दिल में चुभती हैं काँटों-सा

और वे यादें दुःखदायी बनके

ज़िन्दगी की तमाम खुशियों को

निगलती ही जाती हैं घड़ी-घड़ी।

इसलिए समयानुसार इनदोनों का

परित्याग करना अतिआवश्यक है

वरना-तेल ख़त्म तो खेल ख़त्म की

यह बोली जीवन की इहलीला ही

कर देगी ख़त्म एक न एक दिन…!

 

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