#Kavita by Yogendra Sharma Yogi

प्यार,वफ़ा,रिश्ते,नाते सब

दौलत के शौक़ीन हुए

छोड़ मुहब्बत की बाहें सब

फितरत के आधीन हुए।

बदल गए अपनों की बातें

दिन जब से बेदीन हुए

दर्द भी शायद खफा हो गया

जब आँसू गमगीन हुए।

हँस लूँ किसके साथ मैं रो लूँ

सब अपनें में तल्लीन हुए

ऐसी रंगत उतर गई की

फिर ना हम रंगीन हुए।

बना घरौंदा ख्वाबो का

सपनों में ऐसे लीन हुए

समझ सका न कब तरकस

खाली कब तुरीन हुए।

छोड़ मुहब्बत की बाहें सब

फितरत के आधीन हुए।। योगी

योगेन्द्र शर्मा योगी

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