#Kavita byv Gayaprasad Rajat

लोकगीत
दीखत नाय गाम मढ़ैया रे।
कहूँ खुय गई राम मढ़ैया रे।
खुअत जात जे खेत टपरिया,
कहूँ खुइ गयी सोन चिरैया रे।
बदले सब गाम रवैया रे।
दीखति नाय गाम मढ़ैया रे।

अपनी अपनी तुनक में डोलें।
प्रीति रीति की बात न बोलें।
नाय बैठत नीम की छइयां रे
बदले सब—–

ऐसी जी पछुआ हवा चली,
बैरिन ने सब कछु बदल दियो,
सब तोल तराजू बदलि गए,
बदले जे सेर अढैया रे।
बदले सब——

बूढ़े बबा में बात न दीखै,जो पहलिन में होती थी,
गाम हाट की सिगरी बातें,
तब गैलन में होती थी।
जाने कौन से लोक चले गए ,हुक्का चिलम पिबैया रे।
बदले सब—-

भरि अन्टी में कंचा डोलत,
आजा खेलें सब तैं बोलत,
आज कल्ल के खेल बदलि गए,
नाय अब कंचन को खिलबैया रे।
बदले सब—-

कपड़ा की एक गेंद बनाई ,
खेलन को सब फौज बुलाई,
मारा मारी गेंद खेलते,
कलुआ और कन्हैया रे।
बदले सब—–

खेत नराबत दादा भईया,
लैंकें कलेवा आबै मइया,
पीछें पीछै छोटो भईया रे।
बदले सब——

आज कल्ल की नई नवेली,
जानति नाय कछु प्रेम पहेली,
देखन कों अब नाय मिलत हैं,
हड़िया दूध पिबैया रे।
बदले सब—–

सांझ ढले अघियाने जरते,
बातिन के जहां झरना झरते,
नाय रहे अब प्रेम भाव कहूँ,
नाय अघियाने जरबैया रे।
बदले सब—–

घर की बिटिया विदा होत जब,
गोंड़े तक छोड़न जाते,
धरि कन्धा पे सर रोबति तब,
कहि चाची ताई मईया रे।
बदले सब——

कूटि मूँझ कूँ रस्सी बटते, टूटी परी खटुलिया बुनते,
ढूंढे से हु नाय मिलत अब,
कहूँ खटिया के बुनबैया रे।
बदले सब——

फागुन कौ जब लगै महीना,
होरी को छेता रखि जातो,
ढूंढ काटि कैं लाबत लकड़ी,
होरी को पर्वत उठि जातो,
अब गामन में नाय दीखत कोई,
होरी को बडबैया रे।
बदले सब——

पिअरी मट्टी खोदि कैं लाबत,
अम्मा अंगना लीपैगी,
गुज़ियाँ अनरसे सेब बनेंगे ,
मन मे खुशियाँ फूटेंजी,
कहाँ गए वो उखरी धनकुटा,
कमुनी के कुटबैया रे।
बदले सब——-

दीवाली कौ मौसम आयो,
मन मे खुशियां फली फिरैं,
खूब चलावैं बम्ब पटाखे ,फुझड़ियाँ हु खूब झरें,
जौ नाय मिलती गरम जलेबी,
फूले फूले भजत फिरैं,
देखौ जी कैसी हवा चली,
सब आँखिन आँखिन बदलि गयौ,
अब नाय दीखति कोई कहू ऐं,
काहू से कछु कहबैया रे।
बदले सब——-

रक्षा बंधन जब जब आबै,
तब तब बिरन बहिन घर आबै,
झूला परि गए,अम्बुआ डारी,
आय गयीं देखौ बहिन हमारी,
मिलजुल गीत गबैय्या रे।
बदले सब——/-/

गीत मल्हारें सब मिलि गाबै,
सुख दुख की बतियाँ बतराबैं,
काको सजन कहत का कासैं,
कानन कानन ही बतराबैं,
छोटो बिरना नाय दीखति जे,
झोटा को दिवबैया रे।
बदले सब——–

कंडा पे घुमियाँ वय देते,
है जातीं जे बडी बडी,
छोटी लरकिनी नेग मांगती,
धरि कानन पै खड़ी खड़ी,
अब नाय दीखत कहुएँ प्यारे,
एक पैसा की दिवबैया रे
बदले सब——-

बदलि गए सब राग रंग और,
बदलि गए सब चाल चलन,
ऐसौ का प्रगति को आइबो,
नाय रही प्रीति नाय रहयो मिलन,
ऐसी बदरंग भई चुनरि,
नाय दीखत दाग छुड़ईया रे।
बदले सब——–
रजत-आगरा

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