#Kavita byVikram Gathania

गर्मियों का पंछी

यकायक
गर्मियों का पंछी बोल गया था
पीपल के पेड़ से
प्यास का दर्द जैसे घोल रहा था बोलने में
प्रासंगिक हो रहा था दिल डोलने में
पर दिखता पीपल ही था
हरे पत्तों से लदा हुआ
तनिक देर में देखता हूँ मैं
तीन पहाड़ी बुलबुलें उड़ीं थीं
मैंने देखते हुए सोचा था
काश !कोई पुराना आदमी होता पास में
बताता कौन सा परिंदा यह
जो शांत हुआ था धीरेधीरे
गर्मियों  की इस साँझ  !

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