#Kavita by Devanand Saha , Anand Amarpuri

।।।।।।। बिठाया था कभी।।।।।।।

 

बिठाया था कभी सर पे,नजरों से आज गिरा दिया।

न जाने किस खता की सज़ा,आपने मुझे अता किया।।

 

मैंने तो चाहा था सिर्फ,आपको अपना बनाना;

किसके इशारे पर अपने,मुझको बेगाना बना दिया।।

 

मैंने न कि थी आपसे,कभी जफ़ा की उम्मीद;

न जाने मेरी वफ़ा का,कौन सा आपने सिला दिया।।

 

पीना चाहा थाआपकी,आंखों का अश्क-ए-गम;

पर ठुकराकर मुझे क्यूँ, ज़हर का घूंट पिला दिया।।

 

चाहा था गुजारूं मैं, आपके कदमों में क़यामत तक;

ये भी न हुआ मंज़ूर,मुझे ख़ाक में मिला दिया।।

 

करता रहा नज़रअंदाज़,आपकी हर बेरुखी को;

चाहकर भी न आजतक,आपसे कभी गिला किया।।

 

चमन से चला हूँ, अब यह इल्ज़ाम देकर;

किस रक़ीब ने मेरी, जिंदगी को तबाह किया।।

 

सोचा था सोऊंगा चैन से,ओढ़े कफ़न मज़ार पर;

पर मायूसियों को आपने,”आनंद”का पता बता दिया।।

 

देवानंद साहा “आनंद अमरपुरी ”

 

 

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