Kavita by Devesh Dixit

होली, पर कविता।

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बचपन जैसे होली के दिन नहीँ दिखाई देते हैं ।

मतवाली उस टोली के दिन नहीँ दिखाई देते हैं ।।

गिन-गिन कर दिन कटते थे तब, वो भी एक ज़माना था ।

मन तितली सा दीवाना और मौसम बहुत सुहाना था ।।

घर वालों से ज़िद करते थे कपड़े नये सिलाने को ।

पैसा जोड़ा करते थे हम, पिचकारी मंगवाने को ।।

मिलकर खेतों में जाकर हम पीली मिट्टी लाते थे ।

मिट्टी की सोंधी खुशबू से घर आँगन महकाते थे ।।

अब वो हँसी ठिठोली के दिन नहीँ दिखायी देते हैं ।

बचपन जैसे होली के दिन नहीँ दिखायी देते हैं ।।

सुबह-सुबह ही पिचकारी ले सबको संग लगाते थे ।

बुरा न मानो होली है ये कहकर रंग लगाते थे ।।

गेंद खेलते थे होली पे, कितनी मस्ती लगती थी ।

खेल-खेल में ख़ुशी हमें तब कितनी सस्ती लगती थी ।।

नफ़रत की दीवार नहीँ थी, मिलकर ख़ुशी मनाते थे ।

घर-घर जाकर आपस में हम गुझिया पापड़ खाते थे ।।

वैसी अब हमजोली के दिन नहीँ दिखाई देते हैं ।।

बचपन जैसे होली के दिन नहीँ दिखायी देते हैं ।।

जगह-जगह चौपालों पर, तब फाग सुनायी देते थे ।

ढोल मजीरों की थापों पर, राग सुनायी देते थे ।।

बदल गये हैं स्वर सबके अब, अपनी-अपनी ढपली है ।

छूने जाना पैर घरों में, केवल अदला बदली है ।।

आपस में हमने होली का रंग विषैला कर डाला ।

प्यार मुहब्बत की चादर को, मिलकर मैला कर डाला ।।

हमें प्यार की वोली के दिन नहीँ दिखाई देते हैं ।

बचपन जैसी होली के दिन नहीँ दिखाई देते हैं ।।

दूर-दूर से मित्र हमारे होली मिलने आते थे ।

बड़े चाव से हम आपस में, सबको गले लगाते थे ।।

धन दौलत का फ़र्क छोड़कर, मेलजोल व्यवहार करें ।

उम्र बहुत थोड़ी जीवन की, कुछ तो सोच विचार करें ।।

जीवन की आपाधापी में फ़ीके सब त्योहार हुये ।

समय किसे मिलने-जुलने का पर्व सभी बेकार हुये ।।

कहीँ भाँग की गोली के दिन नहीँ दिखाई देते हैं ।।

बचपन वाली होली के दिन नहीँ दिखाई देते हैं ।।

देवेश दीक्षित 9794778813

 

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