#Kavita by Devesh Dixit

सियासत पर व्यंगात्मक कविता।

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बहुत नाज़ से तुझको पाला है बेटा !

बुढापे की लाठी, उजाला है बेटा ।

कभी भूलकर ये इनायत न करना ,

करो चाहे जो भी सियासत न करना ।

 

सियासत तो वोटों का रुख़ देखती है ,

गद्दी औ महलों का सुख देखती है ।

सत्ता के चश्मे से कब सूझता है ,

वहाँ पुत्र वालिद को कब पूछता है ।

तुम कोई ऐसी तिजारत न करना ,

करो चाहे जो भी सियासत न करना ।

 

ये माना कि दौलत नहीँ पास होगी ,

बलंदी औ शोहरत नहीँ पास होगी ।

मगर, नाते-रिश्ते तो चलते रहेंगे ,

बुढापे में हम भी सम्भलते रहेंगे ।

घर में कभी तुम बग़ावत न करना ,

करो चाहे जो भी सियासत न करना ।।

सियासत में मतलब की यारी है बेटा ,

किसकी कहाँ रिश्तेदारी है बेटा ।

सियासत के पलने में जो झूल जाता ,

अपना-पराया सभी भूल जाता ।।

गुजारिश है तुम ये शरारत न करना ,

करो चाहे जो भी सियासत न करना ।

दलदल का गहरा ये दरिया है बेटे ,

काली कमायी का ज़रिया है बेटे ।

सियासत अगर अपना मुँह खोलती है ,

अमन की फिज़ा में ज़हर घोलती है ।

कसम है तुम्हें ये हिक़ारत न करना ।।

करो चाहे जो भी सियासत न करना ।।

देवेश दीक्षित कायमगंज 9794778813

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