#Kavita by Devesh Dixit

वचपन  ।—-

मौजमस्ती के दिन सब पुराने हुए।

बचपना क्या गया क्या सयाने हुए।।

कोई परियों के किस्से सुनाता नहीं।

चंदा मामा को छत पर बुलाता नहीं।।

काम धंधों से अब इतनी फ़ुर्सत कहाँ।

गिल्ली डंडा को खेले ज़माने हुए ।।

मौजमस्ती के दिन सब पुराने हुए।

बचपना क्या गया क्या सयाने हुए।।

मन में उठती उमंगों के मौसम गये।

रंग-बिरंगी पतंगों के मौसम गये।।

तितलियों का दीवाना ये मन ना रहा।

दूर अधरों से सारे तराने हुए ।।

मौजमस्ती के दिन सब पुराने हुए।

बचपना क्या गया क्या सयाने हुए।।

मन को भाते कहाँ कोई मेले हैं अब।

ऐसा लगता है, जैसे अकेले हैं अब।।

सोलवीं साल तक साथ खेले थे जो।

उनसे बिछड़े हुए अब ज़माने हुए।।

मौजमस्ती के दिन सब पुराने हुए।

बचपना क्या गया क्या सयाने हुए।।

देवेश दीक्षित 9794778813

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