#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“वीणापाणि वन्दना”

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सदा हाथ में वीणा और पुस्तक है

और स्फटिक मणिमाला सोहत है

मूरखता के अन्धकार को दूर करे जो

बुद्धिविवेक से शिष्यों को परिपूर्ण करे जो

कमलासन पर शोभित माँ को प्रणाम मेरा

परमेश्वरी सरस्वती माँ को प्रणाम मेरा

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

 

 

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