#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“वक़्त की गीतिका”
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क्यों भला कब क्या कहाँ चलने लगे

हवा पर पाबंदी और काला धुँआ चलने लगे

वक़्त की ही बात है सब वक़्त की कारीगरी

कब हों तनहा साथ कब सारा जहाँ चलने लगे

वक़्त की नज़रों में चढ़ने उतरने का खेल है

साथ ना दे कब ज़मीं कब आसमाँ चलने लगे

वक़्त के बाजार के कुछ अजब ही हैं कायदे

हीरा खाये ठोकरें कब कांच याँ चलने लगे

इस सियासत के सफर में कुछ पता लगता नहीं

कल जो दुश्मन था वो बनके मेहरबाँ चलने लगे

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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