#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

उम्र भर बस ज़िन्दगी का यूँ सफर करते रहे

ख़्वाहिशों के पीछे ख़ुद को दर बदर करते रहे

वो हमारा हो न पाया हम न उसके हो सके

क्यों भला फिर याद उसको रातभर करते रहे

राहज़न से बच गए हम रास्तों को बदलकर

साथ रहकर लूट लेकिन राहबर करते रहे

पता पाया लक्ष्य का जब ज़िन्दगी की शाम थी

अफसोस अपनी भूल का सर पकड़कर करते रहे

स्याह को बस स्याह बोला धवल को बोला सफ़ेद

अपमान सब इस बात पर दुत्कार कर करते रहे

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

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