#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

ख़्वाब और ख़्वाब की ताबीर बदल जाती है

वक़्त जो बदले तो तक़दीर बदल जाती है

अब मुहब्बत यहां जिस्मों की है रूहों की नहीं

कभी तो रांझे कभी हीर बदल जाती है

जो फकीरी को भी पेशा बना के बैठ गए

उन दुआओं की फिर तासीर बदल जाती है

इनको चुना उनको चुना बदला इनको उनको लाये

अपने पैरों की बस ज़ंज़ीर बदल जाती है

जब भी अपना कोई एक हाथ रखे काँधों पर

दर्द कम हो न हो पर पीर बदल जाती है

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

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