#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“यही बस लोकतंत्र है”

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सत्ता वाले कैसे सत्ता फिर पायें

विपक्ष वाले कैसे सत्ता में आयें

यही बस लोकतंत्र है

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पांच बरस खाकर फिर कैसे खायें

खाया हुआ है उसको कैसे पचा पायें

यही बस लोकतंत्र है

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भाषण से जनता को कैसे ठग पायें

ठगकर मूर्ख बनाकर कैसे रख पायें

यही बस लोकतंत्र है

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विपक्ष में सत्ता को जिसपर गरियायें

सत्ता में आते ही उसे सच बतलायें

यही बस लोकतंत्र है

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जाति धर्म और सम्प्रदाय को भड़कायें

और लाशों पे अपनी सत्ता टिका पायें

यही बस लोकतंत्र है

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दलों के दलदल में हम पैठ बना पायें

पैठ बनाकर कैसे सत्ता चर पायें

यही बस लोकतंत्र है

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हाथ जोड़कर पहले तो सत्ता पायें

सत्ता पाकर फिर कैसे हम गुर्रायें

यही बस लोकतंत्र है

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ताक़त से या पद देकर बहला पायें

बुद्धिजीवियों को दरबान बना पायें

यही बस लोकतंत्र है

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झूठ का तंत्र मीडिआ से फैला पाएं

इसी तंत्र से कैसे सबको बहलायें

यही बस लोकतंत्र है

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सत्ता के हर पायदान पे जमूरे बिठलायें

और फिर चैन की बंसी यहाँ बजा पायें

यही बस लोकतंत्र है

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बेशर्मी की सतत साधना कर पायें

बेशर्मी का एक मुजस्सिमा बन जायें

यही बस लोकतंत्र है

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जो हों सहमत उनका दोहन कर पायें

और असहमत को हम द्रोही बतलायें

यही बस लोकतंत्र है

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स्वयंसेवकों के काँन्धों पर चढ़ पायें

उनको सीढ़ी बना के सत्ता हम पायें

यही बस लोकतंत्र है

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नारा गरीबी दूर करो का फैलायें

आड़ में ख़ुद की गरीबी कैसे मिटा पायें

यही बस लोकतंत्र है

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पक्ष विपक्ष का ढोंग सभी को दिखलायें

ढोंग दिखाकर बाँट बाँट कर हम खायें

यही बस लोकतंत्र है

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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

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