#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

अर्श पे उड़ना ,फर्श पे गिरना ,सारे जल्वे काल के

खुशी हो,ग़म हो,इज़्ज़त,ज़िल्लत,सारे जल्वे काल के

कभी धूप है,कभी छाँव है ,रातें काली ,सुबह सुनहरी

सोचें कुछ और होता है कुछ ,अजब  हैं जल्वे काल के

जिसकी भृकुटि की चाल देखकर सुबहोशाम निकलते थे

वो आसाराम सींकचों में अब ,ऐसे जल्वे काल के

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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