#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“गीतिका”

हम दूसरों के दुःख में दुखी क्यों नहीं होते ?

और दूसरों के सुख में सुखी क्यों नहीं होते ?

पैसे को मानकर के सुख सदा ही भागते हैं हम

फिर पैसा कमा कर भी सुखी क्यों नहीं होते?

सब कहते हैं हर चीज बिकाऊ हुई है अब

बिकने को पर तैयार सभी क्यों नहीं होते ?

हम छंदशास्त्र पढ़के कविता लिख तो सकते हैं

पर कविता को लिखकर भी कवि क्यों नहीं होते?

उम्मीद और अरमान पे ही ज़िंदा है इंसां

अरमान पूरे सबके कभी क्यों नहीं होते ?

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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