#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

वक़्त ही दे वक़्त ही ले वक़्त है सरताज

वक़्त के हाथों में इस  इंसान की पर्वाज़

दूसरों को दे रहे तक़लीफ़ वो ये सोच लें

वक़्त की लाठी सदा चलती है बेआवाज़

कभी है वो दोस्त जैसा और कभी वो शत्रु सा

वक़्त के मिलने के हैं हर दिन नए अंदाज़

वक़्त की रहमत पे ऐंठा भूल जाता आदमी

वक़्त ही बेताज करता वक़्त देता ताज

कोई भी नाराज़ हो परवाह मत करना कभी

ध्यान रखिये कहीं बिगड़े वक़्त का न मिज़ाज़

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

 

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