#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

गीतिका(स्वच्छंद)

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हमने कहा ज़रा ठहरो तो बोली ख़ुशी कि जल्दी है

दुःख से पूछा कब जाओगे?बोला क्यों?क्या जल्दी है

मतलब के सब रिश्ते नाते मतलब के सम्बन्ध सभी

हम लोगों ने इस दुनिया की कैसी हालत कर दी है

बदले कई वज़ीर यहां और कई निज़ाम भी बदले हैं

पर भारत की जनता की बदहाली भी क्या  बदली है

लेना जन्म और जीवित रहना जीवन की पहचान नहीं

बेहतर मानव की ही साधना परिभाषा जीवन की है

तू लिख वैसा जैसा तेरा मन और आत्मा कहे तुझे

दुनिया में तो सोच सभी की सुबहो शाम बदलती है

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

 

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