#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

अब रोज चहरे बदलती है ये सियासत देश की

कर के छल बच निकलती है ये सियासत देश की

हम खेत की कहते हैं वो खलिहान की सुनते सदा

कब मुद्दओं पर ठहरती है ये सियासत देश की

वोट मिल जाएँ भले वो धर्म पर या लाश पर

फिर वैश्या सी ठुमकती है ये सियासत देश की

लूट के ग़ुर अलग ढंग हैं जुदा कुछ बहलाने के

कई रंग ढंग बदलती है ये सियासत देश की

वैसे जन का राज है और है भी जनता के लिए

जन को फिर क्यों कुचलती है ये सियासत देश की

आँख में आंसू नहीं अब ख़ून होना चाहिए

कब आंसुओं से पिघलती है ये सियासत देश की

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

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