#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“स्वच्छंद”

“मन से”

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हारना है मन से

जीत भी है मन से

अमीरी तो मन से

गरीबी तो मन से

चल पड़ोगे मन से

थामोगे तो मन से

उठोगे तो मन से

गिरोगे तो मन से

बीमार रहना मन से

स्वस्थ होना मन से

प्यार होना मन से

दुश्मनी भी मन से

दुखी है तो मन से

सुखी है तो मन से

चाहतें भी मन से

नफरतें भी मन से

ज्ञान पाना मन से

अज्ञानता भी मन से

इंसान होना मन से

शैतान होना मन से

दैत्य होना मन से

देवत्व पाना मन से

पुण्य सारे मन से

पाप भी हैं मन से

संसारी रहना मन से

सन्यासी होना मन से

भाया न भाया मन से

अपना पराया मन से

जीना है तो मन से

या मृत्यु है तो मन से

जो भी है वो मन से

जो नहीं वो मन से

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान “

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