#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

ठगना ही फ़ितरत है बस

और लूट इनके खून में

कानून के रक्षक हैं पर

श्रद्धा नहीं क़ानून  में

ईमान से इनको घृणा है

ये हमारे रहनुमा हैं

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सुबह को कुछ और हैं ये

शाम को कुछ और हैं

सत्ता पाने के लिए

इनको न कोई ग़ैर है

शैतान इनसे ही बना है

ये हमारे रहनुमा हैं

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धर्म इनका एक,कुर्सी

जाति इनकी एक,कुर्सी

वोट पाने को अलग पर

बांटें ये हिल मिल के कुर्सी

कुर्सी में ही मन रमा है

ये हमारे रहनुमा हैं

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देश की बातें करें पर

देश को ही बेच खाएं

जनता के दिखते हितैषी

उनको ही ये लूट खाएं

शर्म तो इनको मना है

ये हमारे रहनुमा हैं

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लाशों पे सत्ता मिले तो

इनको ना परवाह कोई

जो इन्हें सत्ता दिला दे

इनका है बस बाप वो ही

कपट से तन मन सना है

ये हमारे रहनुमा हैं

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कला सम्मोहन की इन पे

धूर्तता की हँसी  मुख पे

शकुनि हैं आदर्श इनके

उतरे कलि अवतार बन के

तिलिस्मी ये मुजस्सिमा है

ये हमारे रहनुमा हैं

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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

 

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