#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

झुलस रही है बगिया सारी ,मुरझाई हर डाली है ,

दोष किसे दें,दुश्मन बाग़ का,खुद बगिया का माली है।

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जो थाली में छेद कर रहे,बढ़ता उनका मान यहां ,

माँ को मारें लात,उन्हीं का होता है सम्मान यहां ,

सोचा था होगा सुराज ,तो हम राजा कहलायेंगे ,

दुश्मन जाएंगे तो ,अपने सुख के दिन फिर आएंगे ,

लेकिन सुराज की लाली तो ,कुराज से भी काली है।

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सींचें सभी बबूल ,और रोना ,आम का रोते सभी यहां ,

काँटों को फूलों का रुतबा , देने की है रीत यहां ,

उजियारा अनाथ बेचारा ,अंधियारे के सौ सौ बाप ,

सच कहने वाला बागी है ,झूठे, क़ाज़ी और सरताज़ ,

न्याय बिके बाज़ारों में ,और कचहरियों में दलाली है।

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जागो बाग़ के पहरेदारो ,हमको चमन बचाना है ,

दुश्मन की हर साज़िश हमको,मिलकर विफल बनाना है ,

झूठ के चेहरे का नक़ाब ,अब हमको नोंच फेंकना है ,

जो फूलों के दर्द को समझे ,उसको चमन सौंपना है ,

देर नहीं फिर, ऋतु बहार की ,बस आने ही वाली है।

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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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