#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

इतना दिमाग, …   . व्यर्थ क्यों खपाते हैं ज़नाब,

बहरों को,..  .. आप गीता क्यों सुनाते हैं ज़नाब।

मंझधार में ही छोड़ के,…. .   चल देने में माहिर,

ये नाख़ुदा,….. . .. .  ऎसे ही पाये जाते हैं ज़नाब।

ये ज़िन्दगी है,……. . .  बनिए की दूकान नहीं है,

फिर बहीखाता, …. . रोज क्यों बनाते हैं ज़नाब?

हर झूठ को,……..   बातों से सच में ढालने वाले,

एक दिन, तन्हा ही,…. .  ख़ुद को पाते हैं ज़नाब।

तारीक़ियाँ मिटाने का,……. .   वादा जो करते हैं,

सूरज की रोशनी से,……   ख़ौफ़ खाते हैं ज़नाब।

सच का नक़ाब उठाने,… .  जो आये हैं मान्यवर,

ख़ुद आईने के सामने,….. ..  . शर्माते हैं ज़नाब।

क्या बात दोस्तों की,…… .  ये दुश्मन भी हमारे,

मुश्किल पड़े,……  .. तो हमें ही बुलाते हैं ज़नाब।

जो,………   बैठने का सलीका भी सीख ना सके,

हम चुनावों में,…….. . उन्हें खड़ा पाते हैं ज़नाब।

आप अपनी अक़्लमंदी का,….   न भरम पालिये,

हम जानबूझकर,…….. .  फ़रेब खाते हैं ज़नाब।

छोटे से लोग,……… ..  किन्तु, हों साये बड़े बड़े,

ढलने को सूर्य है,…….. यही बतलाते हैं ज़नाब।

क़ानून, अदालत,……. की हो परवाह हमें क्यों,

अपना सलीब ख़ुद ही,…… हम उठाते हैं ज़नाब।

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान’

 

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