#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

हर मानव की दुनिया में बस इतनी सी कमजोरी,

एक ज़िंदगी ,चाहत इतनीं ,……कैसे होंगीं पूरी?

इसी में उलझा हर इंसान।

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आशाओं ,इच्छाओं का है…   एक आकाश अनंत,

मन की चाह और लिप्सा का, नहीं कभी भी अंत,

मन के अश्वों पर लग़ाम ही,. मुश्किल है श्रीमान।

इसी में उलझा हर इंसान।

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उज्वल भविष्य की चाहत में,.  वर्तमान को खोते,

भविष्य की खुशियों की ख़ातिर,. वर्तमान में रोते,

आज को जी तू,हर भविष्य की नियति है,वर्तमान।

इसी में उलझा हर इंसान।

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धन से दरिद्र होने में क्या दोष किसी मानव का,

पर मन से तो राजा होना,. संभव सारे जग का,

मन की दरिद्रता तो दूर न,.  कर पाए भगवान्।

इसी में उलझा हर इंसान।

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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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