#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

रे नेता काहे होत उदास ।

नहीं सफल इस बार हुआ तो,काहे का घबराना,
बोझ आत्मा पर बतलाकर,सत्ता दल में जाना,
बेशर्मी के साथ पुनः ,….चरना सत्ता की घास ।
रे नेता काहे होत उदास ।

सब में वही आत्मा बसती, अलग अलग है देह,
देह नहीं आत्मा को पकड़ तू ,हो जाएगा विदेह,
सत्ता के वैकुण्ठ में संभव ,देह सहित ही प्रवास ।
रे नेता काहे होत उदास ।

हाथ में माला होनी चाहिए,मन में नागफनी हो,
वस्त्र धवल हों ,चाहे काया,विष्ठा में ही सनी हो,
आशुतोष सी भोली जनता ,कर लेगी विश्वास ।
रे नेता काहे होत उदास ।

सत्ता का एक नया केंद्र हैं ,.. पत्रकार और टीवी,
इन्हें साध ले ,फिर सत्ता को कर सकता है जेबी,
पेड न्यूज़ से कोई शिखर पर ,कोई गया वनवास ।
रे नेता काहे होत उदास ।

दुनिया को बतलादे,…. सेवा की ख़ातिर तू जन्मा,
सभी नागरिक भाई बहिन और जन्मभूमि तेरी माँ,
माँ का क़र्ज़ चुकाने को तू,…. है बलिदानी ख़ास ।
रे नेता काहे होत उदास ।

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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