#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

जब सजें कतारें दीपों की।
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कहीं अँधियारा न दिखाई दे,
बस राम की जय ही सुनाई दे,
घर घर में मिठाई दिखाई दे,
खुश होती प्रजा दिखाई दे,
जब सजें कतारें दीपों की।
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बच्चे सब शोर मचाते हैं,
और खूब पटाखे चलाते हैं,
सब खील बताशे खाते हैं,
सारे मन में हर्षाते हैं,
जब सजें कतारें दीपों की।
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बहुयें सजधज कर आतीं हैं,
बिटियाँ शुभ गीत सुनातीं हैं,
ढोलक मंजीरे बजातीं हैं,
श्री राम के भजन सुनातीं हैं,
जब सजें कतारें दीपों की।
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गालियाँ दुकानें सजतीं हैं,
मन की घंटुरियाँ बजतीं हैं,
ताशों की बाजियाँ लगतीं हैं,
खुशियाँ रोके ना रुकतीं हैं,
जब सजें कतारें दीपों की।
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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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