#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

ख़्वाब,…….. सारे सजाना चाहता हूँ,
मैं,…… ख़ुद को आज़माना चाहता हूँ।
वक़्त होता था,…. . हर इंसान पे जब,
वक़्त,….. .. मैं वो पुराना चाहता हूँ।
बनूँ मैं भी,.. सियासतदान एक दिन,
ख़ुद को,… इतना गिराना चाहता हूँ।
जहाँ,सुख दुख, ख़ुशी ग़म,. एक जैसे,
उसी मरक़ज़ पे,. … जाना चाहता हूँ।
बेवफ़ा इतना,.कि ख़ुद का भी हुआ ना,
उसी का,….. .. साथ पाना चाहता हूँ।
दिनेश,ये वेवकूफ़ी है जुनूँ या बेख़ुदी है,
मैं ख़ुद,. मक़्तल को जाना चाहता हूँ।
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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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