#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

साँझ क्या है ?
और सुबह क्या ?
जन्म क्या है ?
और मृत्यु क्या ?
जैसे दिन का आरम्भ है
सुबह
वैसे ही
जीवन का आरम्भ
यह जन्म
जैसे दिन का अवसान
होती साँझ
मृत्यु भी
जीवन की साँझ ही है
जैसे साँझ के बाद रात
और पुनः दिन निकलता
वैसे ही मृत्यु के बाद भी
पुनः जीवन मिलता
न आना है न जाना है
न उगना है न ढलना है
जीवन का मृत्यु का
सुबह का साँझ का
इतना सा फ़साना है
जो जान गया
विद्वान्
जो न जाना
दीवाना है
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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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