#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“अंतिम कविता”
शाम कुछ ढलने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
रात भी उगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए

काम जितने भी थे पूरे हो चले
नींद भी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
मौत से उम्मीद बाकी रह गयी
ज़िन्दगी छलने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
अब सुकूँ की जगह शबनम से हमें
तपिश सी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
जितने भी देखे जमाने के ख़ुदा
उनसे घिन लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
दोस्त दुश्मन पराये अपनों में अब
दूरी कम लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
आग का बिस्तर मिले कुछ गर्म हों
ठण्ड सी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
एक नई कक्षा नये कुछ सबक़ हों
कापियां भरने लगीं हैं ,अब तो चलना चाहिए
कहना छोडो सच को सुनने से भी अब
ज़िन्दगी डरने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
पेट भरते ज़िन्दगी अपनी हमें
ढोर सी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
ओढ़ने को जो थी चादर दी गयी
मैली सी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
कुछ दिनों से एक पुराने दोस्त की
याद सी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए

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