#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

धैर्य विवेक न हो जहां ,निश्चित बिगरें काज
संभव है दोनों मिलें ,जूते भी और प्याज
बड़ीं बड़ीं हैं डिग्रियां ,नहीं सके पर जान
सहज सरल निष्कपटता सबसे बड़ा है ज्ञान
रक्षक ही ज्यों देश के करें देश की लूट
राजनीति में देश की दिखे वही करतूत
सारे धंधे एक तरफ यह राजनीति बहुधंधी
जनहित केवल ढकोसला है सत्ता लूट की मंडी
जिनकी पहरेदारी में सब देश को लूटें खाएं
उनकी ईमानदारी को हम ओढ़ें या कि बिछाएं
अलीबाबा चालीसचोर का जो किस्सा प्रचलन में
उसका ही दोहराव सियासी भवनों के आँगन में
बुरा लगे या भला लगे ऐ सत्ताधारी सुन ले
राजनीति की भ्रष्टता भ्रष्ट प्रशासन जन्मे
मना आप महान हैं विशेष हैं अधिकार
पर विशेष से भी विशेष हैं जनता के अधिकार
कुछ लोगों को थोड़े समय को मूर्ख बनाना संभव
लेकिन सब को सदा सदा को बहलाना है असंभव
कलियुग के परताप सों समय गया वो आय
कांच छत्र में सोहता ,हीरा ठोकर खाय
बिना विचारे जो करे कांग्रेस हुइ जाय
थू थू होवे जगत में जनता क्रोध जताय
वोट डालना मत देना ही जन की ज़िम्मेदारी
वोट को पाकर लूट करें ये उनकी फ़ित्रत ज़ारी
शत्रु मित्र नज़दीकियां या फिर हो पहचान
राजनीति में किसी को स्थाई मत मान
बाहर से सब अलग अलग हैं अंदरखाने एक हैं
सब की मंशा वही लूट है मौसेरे सब एक हैं
हर दल में कुछ कलमाड़ी हैं हर दल में कुछ राजा
राजनीति की लूटपाट में सबका लगता साझा
इस दुनिया में चुनना मुश्किल अपने माँ और बाप
सहयोगी और मित्र बनाना केवल आपके हाथ
जब उरूज पर वक़्त हो तब भी रखिये याद
वक़्त ही लाता फर्श पर वक़्त ही देता ताज
सबक नहीं इतिहास से लेते हैं जो शख्स
दोहराने इतिहास को होते वो अभिशप्त
कांग्रेस की किस्मत में दिग्गी ऎसी हस्ती
दोस्त के ज्यादा दुश्मन की पदवी जिसपर फबती
धर्म जाति समुदायों में तो बाँट चुके हैं आप
वोट की खातिर कितना क्या क्या अब बाँटेंगे आप
राजनीति की कुटिलता ने कर डाला त्रस्त
अन्ना सा योद्धा हुआ शकुनि चाल से पस्त
पिछवाड़े वो ही रहते हैं डंडे बदलते रहते हैं
पिटने वाली जनता ही है गुंडे बदलते रहते हैं
रैट रेस में हो गए हम इतने मशग़ूल
जीवन जीने की कला ही बैठे हैं भूल
हर दल अपना दांव खेलता रहता अपनी जुगाड़ में
हरेक विषय पर सिर्फ सियासत देश की गरिमा भाड़ में
जाति देखकर टिकट बँटेंगे लेकिन धर्मनिरपेक्ष हैं
जाति देखकर क्षेत्र चुनेंगे लेकिन धर्मनिरपेक्ष हैं
दुनिया में सबकुछ हासिल है चाहे जो लो
बदले में क्या दोगे पहले यह तय कर लो
मानपत्र मिलते हैं कभी तो पत्थर भी मिलते हैं
जीवन में अपमान मान सब सहचर ही रहते हैं
कांच जड़ा हो सिंहासन में लेकिन कांच ही रहता
हीरा भले ही ठोकर खाये पर वो हीरा रहता

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