#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

दूर सबसे वो खड़े हैं

इसलिए तो वो बड़े हैं

ख़ुद को हैं शफ़्फ़ाफ़ कहते

कीचड़ों में जो गड़े हैं

बन नहीं पाए जो साधक

सिद्ध बनने को अड़े हैं

कुर्सियां उनको मिली हैं

रीढ़ से जो जो मुड़े हैं

साथ थे ईमान के जो

खाली हाथों वो खड़े हैं

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