#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

उड़ने की है ठानी हमने ,ये घिसटना अब मंज़ूर नहीं

अंगारे बना लिए आंसू ,ये सिसकना अब मंज़ूर नहीं

सकुचे सिमटे जीवन जीना ,जीवन का बस उपहास ही है

आकाश हमारी मंज़िल है ,ये सिकुड़ना अब मंज़ूर नहीं

बर्दाश्त की अपनी सीमा है ,उससे आगे कायरता है

है पलटवार का समय हुआ ,ये झिझकना अब मंज़ूर नहीं

चलते रहना ही जीवन है ,थमना तो मृत्यु का द्दोतक है

विस्तार विकास का पूरक है ,ये सिमटना अब मंज़ूर नहीं

मालिक होकर भी हम तो सदा, सत्ताधीशों के दास रहे

सत्ताधीशों की महफ़िल में ,ये ठुमकना अब मंज़ूर नहीं

चाहे थोड़ी हो मद्धम हो, पर जो भी चमक हो अपनी हो

सूरज से रौशनी भीख मांग ,ये चमकना अब मंज़ूर नहीं

दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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