#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“स्वच्छंद”

इतने दर्द सहे जीवन में, दुःख से नातेदारी सी

दुःख और दर्द नहीं जब होते,उस दिन रहे उदासी सी

 

 

 

न्याय धर्म के साथ में चलना सहज भला क्या कभी हुआ

दुष्टों के वो साथ खड़ा ,क्या ईश्वर भी कलयुगी हुआ ?

 

समय भला क्या एक सा रहता तू क्यों रोदन करता है

सर पर खड़ा सूर्य भी आखिर संध्या को तो ढलता है

 

पाप पुण्य की फ़िक्र न कर ना सोच जगत क्या कहता है

आलोचक तू बना आत्मा ,मन तेरा क्या कहता है ?

 

छल करके और झूठ बोल ईश्वर को भी छल सकता है

पर तू तो सच जानता है ख़ुद को कैसे ठग सकता है?

 

नेताओं ने राजनीति को इस हद पर ला पटका है

आम आदमी राजनीति में आने से अब डरता है

 

राजनीति का चौथा खम्भा भी अब राजनीति में है

टीआरपी और धन की ख़ातिर फ़र्क न नीति अनीति में है

 

मैं भी राजनीति में आऊँ कुछ दिन से मन करता है

बेगैरत -बेशर्म बनूँ मैं ,इससे पर मन डरता है

 

राजनीति की ख़ातिर जिनको लगे थे राम कल्पना भर

गद्दी की ख़ातिर वो राम से हर दिन रहे याचना कर

 

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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