#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

पहाड़ों पर जरूर जाना चाहिए

क्योंकि उससे पता लगता है कि

ऊँचाई क्या  होती है

और हम अभी कितने छोटे  हैं

सागर तट पर अवश्य जाएँ

क्योंकि उससे पता लगता है कि

गहराई क्या होती है

और हम अभी कितने उथले हैं

आकाश को अवश्य निहारें

क्योंकि उससे पता लगता है कि

विशालता क्या होती है

और अभी हम कितने तुच्छ हैं

सूर्य को भी ताकिये अवश्य

क्योंकि उससे पता लगता है कि

तेज क्या होता है

और हम कितने निस्तेज हैं

चाँद को भी देख लीजिये

क्योंकि उससे पता लगता है कि

शीतलता क्या होती है

और हममें कितनी तपिश है

सरिता में भी उतर कर देखें

क्योंकि उससे पता लगता है कि

निरंतर बहना, चलते रहना ही

जीवंतता ,स्वच्छता ,निर्मलता के लिए आवश्यक है

और हम कितने निर्जीव,क्लिष्ट और गंदले हैं

फलों से लदे वृक्ष,और जलभरे बादलों का अवलोकन करें

क्योंकि उससे पता लगता है कि

अपरिग्रह ही महानता का प्रथम सोपान है

संचय से किसीने ख्याति नहीं पायी

और देनेवाले का ही जगत में मान हुआ है

परन्तु हम कितने परिग्रही और स्वार्थी हैं

पृथ्वी पर भी ध्यान दीजिये

क्योंकि उससे पता लगता है कि

धैर्यवान और क्षमाशील होने का क्या अर्थ है

कष्ट सहकर भी

जगत कल्याण का भाव कितना मुश्किल है

जो दर्द और कांटे सहता वही गौरवान्वित हुआ है

और हम कितने अधीर, क्षमारहित और द्वेष भरे हैं

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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