#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

ओ तूफ़ान उठाने वालो

झूठी रार मचानेवालो

राजनीति की चालों में फँस

ख़ुद ही नंगे मत हो जाना

खेल के देश की इज़्ज़त से तुम

ख़ुद बेइज़्ज़त मत हो जाना

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सरकारें आती जाती हैं

राष्ट्र मगर फिर भी रहता है

जैसे हों आचरण हमारे

ये इतिहास वही कहता है

राष्ट्र विरोधी करके आचरण

भविष्य धूमिल मत कर लेना

सत्ताओं के  दरबारी बन

ख़ुद को कलंकित मत कर लेना

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विद्वानों में मतभेदों की सदा जगह है

मतभेदों को मनभेदों में नहीं बदल ,सुन

हार किसी की भी हो जाए चल जाएगा

देश हार ना  जाए,  मगर ,सुन

मान मिटाकर देश का कोई

सम्मानित क्या हो सकता है ?

कांटे बो कर अपने  घर में

आह्लादित क्या हो सकता है ?

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मूर्ख बनानेवालों को समझादो ये,अब बहुत हुआ

राज चलानेवालों को बतलादो ये,अब बहुत हुआ

इस समाज को घृणा द्वेष की भेंट नहीं चढ़नें देंगे

बहुत बट चुका ये समाज, अब और नहीं बटने देंगे

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सत्ता के व्यापारी हैं ये, इनके हाथों मत बिकना

विवेक से ही निर्णय लेना ,इनकी बातें मत सुनना

भविष्य जब इतिहास को वांचे दोषी हम न लिखे जाएं

आने वाली सभी पीढ़ियां, हमें न दोषी ठहराएं

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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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