#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

ताड़ जैसे तन रहे हैं बौने बौने लोग ,

मोतियों में तुल रहे हैं औने पौने लोग।

देख कर इनकी धवलता रीझ मत जाना कहीं ,

मन से तो कीचड़ सने हैं ये सलौने लोग।

मिरासी भी कवि शिरोमणि बन गए हैं ,

कवि की गरिमा धो रहे हैं ये बिछौने लोग।

हवा का रुख देखकर पहलू बदल लें ,

शहर की ज़ीनत हुए हैं वो घिनौने लोग।

आधुनिक बाज़ार में मत भाव देखें ,

भाव पीतल के बिके हैं सोने सोने लोग।

सब नपुंसक राज के कारण हुआ है ,

तोप जैसे गरजते हैं कुछ खिलौने लोग।

बात गैरत की चले जब महफ़िलों में ,

झांकने लगते हैं अक्सर कौने कौने लोग।

नज़र क्या धुंधला गई ये ज़ुल्म गुजरा ,

गद्दियों पर आ डटे  कुछ काने कूने लोग।

नेपथ्य में भी अब कहाँ सम्भावना है ,

चमचों से आगे अड़े हैं कुछ भगौने लोग।

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

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