#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

मन में उमंग थिरकन तन में

हर जोड़ टूटता लगता है

हर अदा बदल जाती है और

चितवन का ढंग बदलता है

जब देख के आईना ख़ुद की तस्वीर अज़नबी लगती है

यौवन जब आता है दुनिया हर रोज कुछ नई लगती है

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सावन की फुहारें आग लगातीं चाँदनी बदन जलाती है

गुमसुम रहना आदत बनती तनहाई मन को भाती है

ये भरी भराई दुनिया भी हरदम वीरानी लगती है

यौवन जब आता है दुनिया हर रोज कुछ नई लगती है

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पोथी नहीं सुहाती मन को ढाई आखर भाता है

सब ज्ञान धर्म थोथा है मन का रोम रोम चिल्लाता है

हर दास्तान दर्दो ग़म की अपनी ही कहानी लगती है

यौवन जब आता है दुनिया हर रोज कुछ नई लगती है

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रातों को नींद नहीं आती दिन बेचैनी में कटता है

मन हाथ नहीं रहता अपने बस पंछी बना भटकता है

घर की दीवारें जेल ज़िन्दगी कैद की की मानी लगती है

यौवन जब आता है दुनिया हर रोज कुछ नई लगती है

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जगती आँखों सपने दिखते सब भूख प्यास मिट जाती है

कब दिन डूबा कब रात हुई इसकी न ख़बर रह पाती है

जीवन की सारी चहल पहल अक़्सर बेमानी लगती है

यौवन जब आता है दुनिया हर रोज कुछ नई लगती है

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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

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