#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“स्वछन्द”

अगर ग़लत हों कभी हम समझौते की चाह

और ग़लत हो दूसरा तो फिर चाहें न्याय

हम जिसको हैं चाहते नहीं गिनें फिर दोष

जिसे नहीं हम चाहते उसके गुण भी दोष

कोई भी अनुमान हमारा सिर्फ़ कल्पना मात्र

सीख ज़िन्दगी की हैं अनुभव इसे समझ लें आप

भूल प्रकृति है और मान लेना संस्कृति है

पर सुधार कर लेना ही वास्तव में प्रगति है

बहुत कठिन है काम सदा सबसे खुश रहना

उससे कठिन है काम यहां सबको खुश रखना

फ़र्क़ भला क्या अगर फ़ायदा अपना कर लूँ

किन्तु फ़र्क़ पड़ता है भला किसी का कर दूँ

अपना दुःख जब देखते होय बहुत संताप

देख मग़र दुनियाँ में दुःख कम होता संताप

निंदक नियरे राखिये कहने में ही ठीक

आलोचक से किन्तु हैं रहते सब भयभीत

भूषण वस्त्र चढ़े हुए तन पर लाख हजार

किन्तु ज़रा मुख खोलते होंय सभी बेकार

राजनीति है आजकल सबसे सफल व्यापार

मानुस भले की है नहीं किन्तु वहां दरकार

सम्बन्धों के स्वार्थ और स्वार्थों के सम्बन्ध

स्वार्थों के आधार पर अप्रिय  और पसंद

 

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

 

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