#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

आज के दौर की राजनीति में हर चेहरे पर चेहरे हैं

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सब सत्ता के मोहरे हैं

किस्मत ने जो सौंपा जीवन कोई ग़िला नहीं इसका

दिन की ज़मीं भले बंज़र हो लेकिन ख़्वाब रुपहले हैं

सत्ता में रहते जो सच था विपक्ष में वो झूठ बना

सच और झूठ परखनेवाले मानदंड सब दोहरे हैं

जिन्होंने फूँक दिया घर अपना देश को रौशन रखने को

राजनीति की परिभाषा में गुनहगार वो ठहरे हैं

जोरों से चीखो चिल्लाओ थोड़ा सा हुड़दंग करो

बेगैरत सत्ताधीशों के कान हो गए बहरे हैं

कहने को जीवन हैं कहते लेकिन हमें अज़ाब हुआ

इच्छाएं सब पराधीन हैं आशाओं पर पहरे हैं

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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