#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

छन्दमुक्त सरस्वती वन्दना”

माँ  वर दे मुझको  सत्य लिखूँ।

 

जब चारों ओर अन्धेरा हो

असत्य ने सच को घेरा हो

उजियारा तम  के वशीभूत

हर ओर हर तरफ झूठ झूठ

तब अंधियारे  से युद्ध लिखूँ

माँ  वर दे मुझको  सत्य लिखूँ।

 

जब कलम के साधक चाकर हों

गंदे नाले रत्नाकर हों

कवि  भाँड़ मिरासी  बन जाएँ

पद पुरस्कार पर बिक जाएँ

तब कलम बनाकर अस्त्र लिखूँ

माँ  वर दे मुझको  सत्य लिखूँ।

 

ख़िलअत के लिए सर नहीं झुके

सब बिके ये गैरत नहीं बिके

चहिये न ताज की वाह वाह

जन-मन की वाह की रहे चाह

ना लिखूँ ,मगर न असत्य लिखूँ

माँ  वर दे मुझको  सत्य लिखूँ।

 

हर ओर हर तरफ क्रंदन हो

सत्ता -ताक़त का वंदन हो

सब रावण के अनुयायी हों

और राम के साथ न भाई हों

तब छंद नहीं कर्तव्य लिखूँ

माँ  वर दे मुझको  सत्य लिखूँ।

 

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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