#Kavita by Dinesh Pratpa Singh Chauhan

“प्रार्थना”
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प्रभो अगर दे सको तो ये ही वर देना
सभी कामनाओं को सीमित कर देना
फैलाऊँ में हाथ जगत में तेरे सिवा
ऎसा गरीब कभी न मुझको कर देना
हार और नुक्सान भुला दें धर्म मुझे
ऎसा निर्बल मुझको तू मत कर देना
सदा चलूँ मैं धर्म राह, ले तेरा नाम
धैर्य सदा तू मुझमें ये ही भर देना
आशीर्वाद को देने का भी भाव न हो
ऎसा कृपण प्रभो मुझको मत कर देना
गिरे फ़क़ीरों के चरणों सर बार बार
पर शाहों के चरण न मेरा सर देना
“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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