#Kavita by Dipak Charlei

कल मेरा अपनी घर वाली से झगड़ा हो गया

मामूली नही तगडा हो गया

बोली तुम मेरी हर बात को टालते हो

एक कान से सुनते हो दूसरे से निकालते हो

मैंने कहा! इस मामले में तुम कौन सी कम हो

अगर मैं पटाखा हूँ तो तुम बिल्कुल बम हो

शुक्र है  भगवान का कि मैं

आने वाली वला को टालता हूँ

एक कान से सुनता हूँ

दूसरे से निकालता हूँ

मगर तुम तो रोज सब्जी में तेज नमक डालती हो

अगर मैं कुछ कहूँ

तो तुम दोनों कानो से सुनती हो

और मुँह से निकालती हो

एक दिन और हम दोनों में जंग छिड़ गई

कमवख्त पूरी तैयारी के साथ मुझसे भिड गई

बातो ही बातो में मुझे मारने के लिए

लौटा ,गिलास,कटोरी जैसे हथियार

उठा लिये उसने अपने हाथों में

बोली ,परसों तुम्हारे हाथों में मैंने

एक सामान का पर्चा थमाया था

बच्चों के लिए नेकर

और अपने लियें पाऊडर मंगाया था

तुम वो भी नहीं लेकर आए

मुझे ये बताओ तुमने वो सौ रुपए कहाँ उडाय

अरे! क्या उनकी भी पी गए

मैंने कहा- हे! दुर्गा साक्षात देवी

मैं बेचारा हिन्दी साहित्य सेवी

तुम तो जानती हो कि आजकल

सौ रुपये में क्या घर चलता है

ये तो मैं ही जानता हूँ कि कैसे

बच्चों का पेट पलता है

बो बोली  बच्चे कई दिन से भूखे हैं

तुम्ही बताओ मैं उनको खाने के लिए क्या दूँ

कविता की रोटी सेकूं

कविता की सब्जी  बना दूँ

मैंने कहा!   अरे पगली ऐसी बात क्यूँ करती है

सरकार हम कवियों के बारे में भी जरूर सोचेगी

देखना एक ना एक दिन ये बात

सरकार तक जरूर पहुँचेगी

तुम देखना मुझे भी सम्मान मिलेगा

वो बोली , बहुत हो गया जरा ये

सोचो कि कैसे घर चलेगा

तुम तो मेरा दिमाग खा गए

तुम से घर नही चलता

अटल जी कवि होकर पूरे पाँच साल

सरकार चला गए

मैंने कह! उन्हें भी आटे दाल का भाव

पता चल जाता अगर वो भी शादीशुदा होते

दो बच्चे स्कूल जाते और दो भूख से रोते

मैंने कहा! इस मामले में तू बिल्कुल नादान है

इस महँगाई  के जमाने में गृहस्थी चलानी है

मुश्किल और सरकार चलानी आसान है

 

दीपक चार्ली हास्य व्यंग्य कवि एवं अधिवक्ता  –  मुरादाबाद

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