#Kavita by Dr Abha Mathur

अधिक  न   बोलो

एक तालाब किनारे रहता

था  एक  कछुआ  मोटा

वहीं  पास  में  रहता  एक

सुन्दर  जोड़ा  सारस  का

बातूनी था कछुआ  हरदम

बक बक  करता  रहता

मित्र  बन  गये कछुआ और

सुन्दर  सारस  का  जोड़ा

गर्मी आई सूखा जब

तालाब  हुए चिन्तातुर

राय बनी तालाब  छोड़

अब चलते हैं गंगातट

सारस तो उड़ सकते थे पर

कछुआ  कैसे   उड़ता ?

नर सारस ने सोचा तब

एक नया विचित्र  रास्ता

उसने कहा “एक डंडी को

दोनों  सारस  पकड़ें

बीच में कछुआ भाई मुख से

उस  डंडी  को  पकड़ें,

उड़ान भरें जब  दोनों सारस

डंडी  भी  उड़   जाये

मुख  से  डंडी  पकड़े

कछुआ भाई उड़ते जायें ”

यह विचार तीनों ही मित्रों

के मन  को  अति भाया

ढूँढ ढाँढ कर सारस एक

मोटी सी  डंडी  लाया

सारस ने तब दी सलाह

“यह सुन लो कछुए भाई

अगर सुरक्षित उड़ना है

चुप रहने में है  भलाई”

कछुए ने सहर्ष  स्वीकारी

सलाह यह अति  सुन्दर

अगली सुबह उड़ चले तीनों

पहुँचे शीघ्र  गगन  पर

जंगल-जन्तु चकित थे देख

कर ,नभ में दृश्य  अनोखा

आसमान में उड़ता कछुआ

कभी  नहीं  था  देखा

तरह तरह की बाते करते

पशु   नीचे  धरती  पर

एक  दूसरे को  दिखलाते

उँगली  से  दिखला  कर

देख  देख उँगली पशुओं की

कछुए का  धीरज  डोला

तभी पास आ एक  कउआ

उसके  आगे यह बोला

“नभ में उड़ने की  तुमको

यदि  इतनी  है  अभिलाषा,

अपने  दम पर उड़ना  सीखो

सीखो  पक्षी  की  भाषा ”

सुन कर धैर्य चुका कछुए

का , ग़ुस्सा  उसको  आया

डाँट लगाऊँ कौए को

यह  उसके मन में आया

जैसे  ही  कुछ  कहने  को

उसने  अपना  मुख  खोला

डंडी छूट गई  मुख  से

गिर  पड़ा जमीं  पर  धम से

बच्चों जब भी  बोलो तुम

सब  सोच समझ  कर बोलो

जब  तक  न हो बहुत ज़रूरी

तब तक  मुख  ना  खोलो

डॉ.आभा माथुर

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